नकल एक ऐसी गतिविधि जिसे कर मानव अपना  विकास करता है । फिर वो बचपन मे आस पास मौजूद लोगों की नकल कर बोलना हो ,इशारो से हाव भाव भांपना हो, हो भाषा सीखनी हो बड़े होने पर  संगीत नृत्य अभिनय ,व्यवसाय ,खेल या कुछ भी सीखने के लिए मनुष्य नकल कर के अर्थात सामने वाले को ऐसा करते देख प्रेरित हो उस जैसा कुछ करने व सीखने का प्रयास करता है ।

अर्थात नकल मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग है ।

लेकिन ये नकल अस्वीकार्य तब हो जाती है जब आपकी प्रतिभा का आंकलन किया जा रहा हो , कोई प्रतियोगिता हो या कोई परीक्षा क्योकि प्रतिस्पर्धा के युग मे जितनी पारदर्शिता हो उतना बेहतर ।

लेकिन जरूरी नही की हर बार नकल की कथा बिहार से ही निकले , तो इस बार बात हो रही है दिल्ली विश्वविद्यालय की, जो सम्पूर्ण भारतवर्ष की एक प्रख्यात सुप्रतिष्ठित शिक्षण संस्था है ,लाखो छात्र अपने सपनो को पंख दे एक सफलता की उड़ान भरने यहाँ दाखिला लेते है ।

इस पढ़ाई की प्रक्रिया का एक हिस्सा “लिखित परीक्षा “है।

इस परीक्षा को देते वक्त आप अनुभव करते हो कि आपका बगल वाला पूरे परीक्षा के दौरान मोबाइल से देख देख कर उत्तर लिखता है , तो कोई ताक झाक कर 33 के आकंड़े तक पहुचने की जुगत में लगा रहता है , तो परीक्षा देने हेतु कॉलेज परिसर की और जाते वक्त कोई आपको नकल के चिट्स बनाते हुए मिलता है और तब तो हद ही हो जाती है जब परीक्षा के दौरान वाशरूम जाने पर पूरे वाशरूम में जमीन पर किताबे नोट्स और नकल की सामग्री जमीन में पड़ी हुई मिलती है ।

और ये सब हो रहा है कॉलेज व विश्विद्यालय प्रशासन के ठीक नाक के नीचे , जांच टीम व पर्यवेक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है ।

लेकिन ऐसा भी नही है की जांच टीम कोई काम नही कर रही व निष्क्रिय है ,विगत दिवस ही 2 से 3 छात्रो को नकल की सामग्री से युक्त पाए जाने पर उन्हें विश्विद्यालय ले जाकर उनका नामांकन भी रद्द किया गया , लेकिन सवाल फिर यही गहराता है की

क्या ये समय समय पर निरक्षण ,गिनी चुनी कार्यवाहिया कितने हद तक इस समस्या का निदान कर पा रही है ?

लेकिन एक मिनट क्या ये समस्या वाकई है ?

जिसे आप परीक्षा कह रहे है क्या वो वाकई परीक्षा है ?

क्योकि परीक्षा का मतलब कमोवेश समान स्तर के छात्रों के बीच प्रतिभा का/ ज्ञान का आकलन है।

लेकिन ये लिखित परीक्षा तो केवल एक खास तरह की प्रतिभा को तवज्जो देती है ,और ये बिल्कुल ज़रूरी नही की सब के सब किताबी प्रतिभा के धनी हो । ये भी हो सकता है की कोई नृत्य संगीत अभिनय चित्रकारी खेल साहित्य इन प्रतिभाओ से वास्ता रखता हो ।लेकिन आपके उत्तर पुस्तिका में तो केवल किताबी प्रतिभा की ही परीक्षा का आकलन होता है !!

और जरूरी नही की हर छात्र किताबी कीड़ा हो ।

ऐसे में अगर वो नकल करता है तो क्या इसका मूल कारण ये मध्ययुगीन मशीनी शिक्षण व्यवस्था नही है ? जो समावेशित नही है ।

भिन्न क्षमताओं व कौशल का आकलन करने का जिसके पास कोई मापदण्ड नही है । जो असमान क्षमताओं को रखने वालो के बीच एक ऐसी प्रतिष्परधा कराता है ,जिसमे केवल कुछ ही निपूण है ।जो अच्छे अंक से ही आपके भविष्य का मार्ग प्रशस्त करती है

हर किसी का मस्तिष्क एक कौशल या एक तरह की प्रतिभा का धनी नही होता है ऐसे में अंक हासिल करने के लिए अगर कोई शॉर्टकट अपनाता है तो उसमें नैतिकिता का प्रश्न उठाना कहां तक सही है।

ठीक उसी प्रकार की क्रिकेट के मैदान में कुश्ती खेलने वालों और क्रिकेट  खेलने वालो के बीच क्रिकेट मैच कराकर आप क्षमता का आकलन करो ।

ऐसी प्रतिष्परधा जो पक्षपात का द्योतक है ,क्या उसे शिक्षण व्यवस्था में जारी रखनी चाहिए ?

हम परीक्षा में होने वाली नकल का समर्थन नही करते ,छात्रो को नकल नही करनी चाहिए हम इसके प्रबल समर्थक है, क्योकि यह नैतिक नही है । लेकिन फिर सवाल गहराता है की क्या नैतिक है और क्या अनैतिक यह कौन सुनिस्चित करेगा ? क्योकि इसमें उन छात्रो का भी क्या दोष क्या वो जिस परीक्षा में बैठा है वो वाकई उसकी प्रतिभा का आकलन कर रही है ?

नीति निर्माता पता नही कब नींद से जगेंगे !! लेकिन हा हम अपने स्तर पर नकल ना करके परिवर्तन ला सकते है । नकल करने के वजह से अत्यधिक छात्र पास हो जाते है जो नीति निर्माताओ के लिये आश्वाशन का काम करता है । जब अनुतीर्ण छात्रो की संख्या बढ़ेगी तब शायद ये हरकत में आये !!

हमे तो यही लगता है , आपको क्या उपयुक्त समाधान लगता है , ज़रूर साझा करें !!

A Social Media geek who enjoys writing about youth and their life. Marketer by profession, Digital marketer by passion.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here